जोधपुर।
Rajasthan High Court ने पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्तियों को थाने के बाहर बैठाकर उनके फोटो खींचने, उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया में प्रसारित करने तथा कथित रूप से अपमानजनक परिस्थितियों में पेश करने की प्रथा पर कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। अदालत ने इसे न केवल असंवैधानिक बताया, बल्कि Constitution of India के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और गरिमा के अधिकार का सीधा उल्लंघन करार दिया है।

👩⚖️ अदालत का स्पष्ट संदेश
न्यायमूर्ति Farjand Ali की एकलपीठ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्धि से पहले अपराधी की तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित करना कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता पर सीधा आघात है। अदालत ने अंतरिम आदेश में पुलिस को निर्देश दिया कि गिरफ्तार व्यक्तियों की सभी तस्वीरें और संबंधित सामग्री तत्काल सोशल मीडिया, वेब पोर्टल्स और अन्य प्लेटफॉर्म्स से हटाई जाएं।

📸 फोटो वायरल करने की प्रथा पर स्वतः संज्ञान
अदालत ने मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर स्वप्रेरणा से संज्ञान लेते हुए हालिया मामलों में कड़े आदेश दिए। विशेष रूप से, एक वरिष्ठ अधिवक्ता को थाने के गेट पर बैठाकर फोटो वायरल करने के मामले में जोधपुर पुलिस आयुक्त को 24 घंटे के भीतर सभी तस्वीरें हटाने और अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया।
इस संदर्भ में अदालत ने Dainik Bhaskar में प्रकाशित रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें जोधपुर कमिश्नरेट क्षेत्र में एक प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता की गिरफ्तारी के बाद उसकी तस्वीरें वायरल होने का विवरण सामने आया था।
🏜️ जैसलमेर प्रकरण: गंभीर आरोप
Jaisalmer निवासी असलम व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष बताया गया कि पुलिस द्वारा महिलाओं सहित कई व्यक्तियों की तस्वीरें थाने के बाहर बैठाकर खींची गईं और उन्हें मीडिया व सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया।
याचिका में आरोप लगाया गया कि
- पुलिस न्यायाधीश की भूमिका निभाते हुए अभियुक्तों को अपराधी की तरह पेश कर रही है।
- कुछ मामलों में अभियुक्तों को कपड़े उतरवाकर या केवल अंडरगारमेंट्स में बैठाकर फोटो लिए गए।
- इनमें अविवाहित युवतियां भी शामिल थीं, जिनकी तस्वीरों से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा।
🧠 “दोषसिद्धि से पहले दंड” पर कड़ा प्रहार
अदालत ने दो टूक कहा कि
“कोई भी व्यक्ति केवल अभियुक्त होता है, दोषी नहीं। दोषसिद्धि निष्पक्ष ट्रायल के बाद ही संभव है।”
कोर्ट ने रेखांकित किया कि गिरफ्तारी के साथ गरिमा का अधिकार समाप्त नहीं होता। किसी व्यक्ति को फर्श पर बैठाना, निर्वस्त्र या आंशिक रूप से निर्वस्त्र करना और उसकी तस्वीरें सार्वजनिक करना संस्थागत अपमान है, जो मानवीय गरिमा पर सीधा हमला है।
🧑⚖️ अधिवक्ता देवकीनंदन व्यास के तर्क
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता देवकीनंदन व्यास ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ऐसी प्रथाएं खतरनाक रूप से सामान्य हो चुकी हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह का सार्वजनिक अपमान किसी व्यक्ति की सामाजिक छवि को स्थायी नुकसान पहुंचाता है और गरिमा के साथ जीवन जीने के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
अदालत ने उनकी दलीलों से सहमत होते हुए उन्हें न्यायमित्र नियुक्त किया और मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी तय की।
📜 सरकार को नोटिस, पुलिस से जवाब तलब
हाईकोर्ट ने
- अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी को नोटिस स्वीकार कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
- पुलिस अधीक्षक, जैसलमेर को शपथपत्र दाखिल कर आरोपों पर विशिष्ट उत्तर देने का आदेश दिया।
- यह सुनिश्चित करने को कहा कि पुलिस द्वारा अपलोड की गई सभी तस्वीरें और सामग्री तत्काल हटाई जाएं।
🔔 अदालत का ऐतिहासिक संकेत
राजस्थान हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य दंड नहीं, न्याय है। दोषसिद्धि से पहले किसी भी नागरिक की गरिमा को कुचलना न तो संविधान स्वीकार करता है और न ही न्यायपालिका। यह फैसला पुलिसिंग की सीमाओं पर एक संवैधानिक लक्ष्मण रेखा खींचता है।









